क्या बनोगे ?
ये शायद वो सवाल हे जो ज़िन्दगी में मुझसे सबसे ज़्यादा बार पुछा गया और शायद वो भी जिस का मेने ज़िन्दगी में हमेशा सही जवाब दिया हे ।
हाल ही में ये कारनामा मेने एक एम् एन सी में नौकरी पाने के लिए दिए इंटरव्यू में किया। आप पोंछेंगे की जवाब सही था इसकी क्या गारंटी हे । भाई, नौकरी मिल गई तो जवाब सही ही था , ग़लत जवाब पे नौकरी देने वाले तो कम ही लोग होते हें ।
अगर में अपनी मेमोरी पे ज़ोर डालू तो याद पड़ता हे की पहली बार भी इस सवाल का जवाब एक इंटरव्यू के दोरान ही दिया था । तब हम स्कूल में दाखिला चाह रहे थे, खेर वो बात और हे की दाखिले की चाहत हमारे माँ बाप की ज़्यादा थी। जवाब तब भी सही था, जी हाँ आप ठीक समझे, हमें दाखिला मिल गया । मजे की बात ये थी की हमारे पिताजी ने सब अंग्रेज़ी में पहले ही रटा दिया था, मुझे तो अपने जवाब का मतलब भी नही पता था, लेकिन दोस्तों दाखिला तो मिल गया ।
गोर करने की बात हे की हमारी बेहन ने भी स्कूल में दाखिले के लिए इंटरव्यू दिया था । वो प्रेप में दाखिला चाह रही थी । उनसे बोला गया की ' राइट ऐ टू जेड ' । हमारी बहन ने लिखा ' A two Z' और कॉपी टीचर को दे के आ गई । फ़ैल तो होना ही था । बहुत मिनात्तो के बाद उसको दाखिला मिला पर हम तो जीनिअस प्रूव हो रहे थे, एक बार रटाया और सही जवाब ।
ये सही जवाब देने का सिलसिला फिर न थमा। सभी अंकल- आंटी, मामा - मामी , चाचा- चाची , यहाँ तक की दोस्तों के माता पिता, सब ने ये सवाल कभी न कभी ज़रूर किया । अगर सबसे ज्यादा पूछने वाले को गोल्ड मैडल देना पड़े तो ये तमगा स्कूल के टीचरों को मिलेगा। सभी हर साल सेशन शुरू होने से पहले बच्चों से बारी बारी ये ज़रूर पूछते थे की ' आगे चल के क्या बनोगे ?' । छुटपन में हमने टीचरों को हमेशा सही जवाब दिया, की हम बड़े हो कर टीचर ही बनेंगे । मुझे तो आज तक याद हे की जब आधी क्लास इसे मोको पे टीचर ही बनना चुनती थी, तो हमारे अध्यापको के चेहरे पर अजब सी खुशी होती थी। जेसे - जेसे हम बड़े हुए, हमारे केस में टीचरों की आवाज़ में उत्साह कम और ये सवाल करते हुए देस्परेशन ज़्यादा होती थी । कई बार लगा मनो वो कह रहे हो क्यो भाई रंजन कुछ बनोगे या नही ?
बहराल घर के भीतर भी ये सवाल कई बार हमसे पुछा गया । कई बार तो घरवालों ने हमसे पूछना भी ठीक नही समझा, बस हमे बता दिया की हम क्या बनेंगे। जेसे छुटपन में हमे अपने सभी खिलोनो के अंजर पिंजर अलग अलग करने का बड़ा शोक था। मंशा होती थी की इन्हे फिर ख़ुद जोडेंगे । हमारे इस पेशन की भेंट हमारे खिलोनो के साथ साथ हमारी बहन की गुडिया भी चद्ती थी । कई बार हमने अपनी बहन की गुडिया की आँख निकाल ली ये गुथी सुलझाने के लिए की वे लेटाने पर अपनी आँख अपने आप केसे बंद कर लेती थी । हमारे पिताजी को लगा की हम इंजिनीअरिंग मटेरिअल हे , फिर क्या था हमने दूसरी पास भी नही की थी घर में रेसनिक एंड हेलिदय , यूनिवर्सिटी फिजिक्स, मोरिस्सन बोय्द जेसी किताबों की भरमार हो गई । वो ये अनदेखा कर देते थे की ये कुछ जोड़ तो पता नहीं बस सब कुछ तोड़ ही देता हे । शायद पिता थे इसलिए ।
खेर हमने भी अपनी दोस्तों को इन किताबों को दिखा दिखा के बहुत शेखी बघारी । बहुतो को समझाया की नम्बर इसलिए अच्छे नही आ रहे क्योंकि में तो इन किताबो को पड़ रहा हूँ, स्कूल की पद्दाई का टाइम किस के पास हे । सच तो ये हे की आज शायद मेरे वोह दोस्त ही मुझे बता पाए की उन किताबो में आखिर था क्या क्योंकि इंजिनीअर तो वो लोग बने, में नही । वो किताबे तो अंत में उन्होंने पड़ी मेने नही ।
हमारी माता को भी हम से बहुत उम्मेदे थी । कपिल रिटायर हो गए थे , प्रभाकर में वो बात नही थी। यानी देश और मम्मी को एक allrounder की ज़रूरत थी । खेल भी हमने बहुत खेला , ठीक ठाक खेलने के बावजूद कभी स्कूल टीम में भी प्रवेश नही पा सके । यानि घर में पाँच बल्ले और रोज मम्मी के साथ घर में प्रक्टिस के बावजूद एक बिलों एवरेज खिलाड़ी ही बने । यानि समय के अनुसार और सामने वाले व्यक्ति को देख हम कभी इंजीनिअर, तो कभी क्रिक्केटर, टीचर, और हाँ commandar अंकल के लिए पायलट भी बने (भाई कोई पाँच bat इसे थोड़े ही गिफ्ट करता हे, उनका का भी तो हक़ बनता हे) ।
ये तो पुरानी बाते हे , आजकल हम अन्तेर्प्रेंयूर बन रहे हे । कम से कम उस एम् एन सी के इंटरव्यू में तो ये ही बने थे जब उन्होंने पुछा ' क्या बनोगे' ?
Would like to add that though I had often thought about this through out my life, I had never been able to articulate it. I would like to acknowledge that I have been inspired by a blog maintained by a friend of mine to articulate it. I am not sure if I have still been able to do justice to it.

4 comments:
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अमित के. सागर
(उल्टा तीर)
Very nice ! bahut accha likha hai!
You are Welcome to my blog!
www.chitrasansar.blogspot.com
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