Monday, November 3, 2008

डरता हूँ

आज फिर बिस्तर से डर सा लग रहा हे। डरता हुं की कहीं नींद का इंतज़ार न करना पडे। सोचा हे की बिस्तर की तरफ तभी रुख होगा जब बदन थकान से चूर चूर हो जाए और नींद अपनी आप ही आगोश में ले ले । अक्सर ऐसा होता हे की में बिस्तर तक तो ठीक ठाक आ जाता हूँ, लेकिन एन मोके पर नींद साथ नही देती। फिर क्या भाई, ज़िन्दगी के सारे गम तभी याद आने लगते हे और उन से झूट मूट की लडाई रात भर लड़ी जाती हे।


आजकल कुछ मूड भी अछा नही हे। समझ आ रहा हे की ज़िन्दगी लड्डू नही हे की खा लो और हो गया। उसे तो जीना पड़ता हे, चाहो या न चाहो । एक चीज़ लेकिन में भी सीख गया हूँ, की बेशक लोगों को खुशी कुछ नया या अनोखा पाने से मिलती हो, लेकिन जीवन में सबसे बड़ा दुःख वो चीज़ खोने पे होता हे जो सब के पास होती हे और आम होती हे । आप ही ऐसे व्यक्ति रेह जाते हे जिस के पास वो न हो। कहने को वो संसार में कोम्मन होती हे लेकिन आप की ज़िन्दगी में अनकोम्मन हो जाती हे।


आप के आस पास सभी उसको फॉर ग्रांटेड लेते हे, बेपरवाह की वो कितनी कीमती हे। आप का मन रो उढ़ता हे यह सोच कर की मेने ऐसा क्या किया हे जो यह मेरे पास नही, बाकि ज़माने भर के पास तो इसकी भरमार हे। उस समय आप उन सभी अनोखी चीजों का त्याग करने को तत्पर हो जाते हे उस वैरी कोम्मन सी चीज़ को पाने के लिए। लेकिन दोस्त ये कोम्मन चीजे आप कितने ही जतन कर ले आप को फिर नही मिलती । इनका होना या न होना किसी और के हाथ में होता हे। आप को तो एक सबक मिल जाता हे की जीवन में वो पल भी आता हे जब बड़े से बड़ा व्यक्ति भी बेबस अपने विधाता से उस वैरी कोम्मोन चीज़ की भीक मांगता हे जो शायद आज से पहले उसने नोटिस भी नही की थी।


इकोनोमिक्स के लो हे मार्जिनल उतिलिटी ......... और ......मार्जिनल कोस्ट के ....... यहाँ शायद ये काम नही करते।


आज पहली बार हिन्दी में लिखा....अब शायद नींद आ जाए ।


लोगों को पहले झाती thok के बोलता था की कहीं सुला लो सो jaunga ....आज आलम यह हे की अपने ही बिस्तर से डर lag raha हे ।

1 comment:

Anonymous said...

ह्म्म...लगता है मन बहुत अशांत है।
जिन्दगी के दौर हैं जी....आते जाते रहते हैं।
हमारी शुभकानायें आपके साथ हैं।

और बाकी जो मन में आये...यहाँ लिखते रहिये...मन हल्का हो जायेगा।