Thursday, November 12, 2009

Lunch Ki Kahani

I heard someone say ....it’s the third time that you got that same sabzi this week.’ It’s good, I love gattey ki sabzi... and we are having a Rajasthani food festival at home', I say as I dig into a dabba filled with baingan ka bharta of a panju colleague.... I have already picked up a piece of fish from my Boss's dabba and praised Bhabhi ji's cooking twice and some tamarind rice from a mallu friend to go along with my rotiz.

I wonder how this mallu friend managed to finish her lunch before I joined this office and helped her do so.

But the Panju girl is smart....'sabzi is good, soopriti ko bolna recipe bhejey.

'Oh its simple.....I say try making a dhokla’

....and when you fail....cut the mazboot besan ka cake into smaller cubes and prepare the sabzi.....Wify has tried making it (the dhokla not the sabzi) thrice this week.

You see I have been a victim of Gujju food not Rajasthani...I correct myself.

There is laughter in the room, but the women soon come in support of their fellow being.....I realise that the fight is really on, when the mallu girl picks on the Bhatoora that I had eyed....I realize that she suddenly seems to have an improved appetite, grabbing stuff that would have otherwise reached me.

So off goes my chance of grabbing on some chola bhatoora....but the guys liked the joke....

finally, ....the fatherly figure of our office intervenes.....Suresh ji, as we call him, says....next time we meet soopriti, we will tell her what you say about her cooking.

I ignore the warning, grabbing the karela that was left in one of the dabbas on the table.

Monday, July 13, 2009

Niether an Angel nor a Demon

HAVE YOU EVER



avoided a friend when he needs your help?

spoken lowly/insulted/abused someone who is part of family?

done something that landed a collegue in trouble?

helped an unknown?


defended/cared for someone whom you considered undesirable in the family?

covered up for your collegue/boss when he ran into trouble (and new he didn't deserve it)?


Well, I tried to think about some of these before I slept yesterday. Surprisingly, I realised that the answer to each one of them was a yes. And further surprisingly, the instances when I had been wicked, brought a smile to my face. I also realised that the more wicked I was, broader was the smile on my face. So what made me feel so good about my wickedness?

I think it was nothing good that made me smile. It was just a mix of emotions. A concoction of embarassement, my juvenileness and the comprehension of the futility of my act of wickedness. But then don't we all behave the way I have in life. Don't we behave like angels at times and at times like demons. But am I an Angel? I would love to be known as one, but I know that thats not what I always am. So am I a Demon? Surely not.

So who am I? Maybe I am somewhere in between. And maybe a large majority of us are that way. 'Neither an angel nor a demon'. Its just that we behave differently each time. So when I could be an angel one time and a demon on another, then why judge others on specfic instances. Give everyone a chance to be an angel, its human nature.



Monday, June 22, 2009

घर लोटे चैंपियंस

रोज़ की तरेह सुबह जब हम उठे, तो आदत अनुसार टीवी पे न्यूज़ सुनने के लिए घर के आगे वाले कमरे की और चल दिए । दूर से ही बाबा राम देव की आवाज़ सुनाई दे रही थी । लेकिन आज चैनल चेंज करना उतना कठिन नही था क्योंकि पानी दो दिन बाद आया था । तो हमारी माँ पानी भरने में लगीं थी। रिमोट ले हमने एक एक कर दो तीन न्यूज़ चैनल्स चेंज कर डाले। सभी पे, 'घर लोटे चैंपियंस' के केपशन्ज़ के तहत सुबह की मेजर स्टोरी दिखाई जा रही थी ।

समझ में नही आया की ये रातो रात भारत के चैंपियंस कौन बन गए थे । थोड़ा ध्यान से देखने पे ये तो दिखाई दिया, की न्यूज़ चैनल के पत्रकार बहुत मुश्किल से भीड़ के बीचों बीच , धकम धुका में खड़े हो कर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाये भी ले रहे हे । लोग अपनी नाराज़गी भी व्यक्त कर रहे थे, उनका मन्ना था उनके चैंपियंस को उनसे मिलने नही दिया गया । पहली बार को तो लगा जेसे में ए़क आद दिन शायद सो गया था, इसलिए कुछ मिस कर गया हूँ । लिकिन ये पहेली जल्द ही सुलझ गई, न्यूज़ पड़ने वाली मैडम (बिजनस सूट पहने) की बोलने की बारी आई, और उन्होंने बताया की आज की मुख्य ख़बर थी की पाकिस्तान की विजयी टीम आज स्वदेश लोटी।

तो आज हमारे चैनल्स जश्न बना रहे थे पाकिस्तानी टीम के स्वदेश लोटने का और टी २० वर्ल्ड कप जीतने की । सच कहूं तो बात कुछ हजम नही हो रही थी , करीब आधे घंटे का कवरेज पाकिस्तान टीम के घर लोटने पे हुए जश्न का ।

कुछ दिन पहला सुना था की भारत की खिलाड़ी साइना नेहवाल ने इंडोनेशिया ओपन जीता था....क्या वो घर अभी तक नही लोटी थी , या हमारी महिला टीम जो टी २० वर्ल्ड कप के सेमी फाईनल में पहोची थी, क्या वोह लोग वापिस नही पहुचे की हमारे न्यूज़ चैनल्स को पाकिस्तान जा उनकी टीम के कवरेज में लगन पड़ा । और मज़े की बात ये की ये वोह ही न्यूज़ चॅनल हे जो भारत के पकिस्तानी दोर्रे के रदद करने के समर्थन में थे और जिन्होने अपने विशेषज्ञ के साथ मिल पाकिस्तान के टी २० जितने के चांसेस को खारिज कर दिया था ।

वाह रे मीडिया ! बिल्कुल बेपेंदी के लोटे की तरेह कहीं भी झुक जाते हो ।

Tuesday, May 12, 2009

हमारा नेता केसा हो .........

आज कल पॉलिटिकल माहोल कुछ गरम चल रहा हे । एहसास तब हुआ जब आज सुबह ऑफिस में साथियों के साथ रात हुए आईपीएल के मेच पे चर्चा करते करते हम न जाने कब इलेक्शन के बारे में बात करने लगे । यदि हमारे देश में क्रिकेट छोड़ किसी और चीज़ पे चर्चा हो, समझ लीजिये की मामला गंभीर हे । लोक सभा चुनाव अब ख़तम ही होने वाले हे और ये क्लिअर नहीं हो पा रहा हे की किस पार्टी को बहुमत मिलेगा । भाजापा और कांग्रेस छोटी मोटी पार्टियों से जोड़ तोड़ में लगी हुई हे पर स्थिति रोमांचक बनी हुई हे, मानो क्रिकेट वर्ल्ड कप चल रहा हो और जीत इस पे निर्भर करती हो की बांग्लादेश और बरमूडा के मैच का क्या रिज़ल्ट होगा ।

मज़ा तो आ रहा हे पर लिखते हुए आज बहुत बुरा लग रहा हे । यकीन मानिये में कोई बुद्धिजीवी टाइप का आदमी नहीं हूँ जो राजनीति को गहराई से जानता हो , मगर में भारत (कुछ लोग जिसे विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी बोलते हुए थकते नहीं) के उन पचास फीसदी लोगों में से हूँ जिन्होने इस बार भी वोट नही दिया । बहुत से लोग इस चीज़ को ग़लत मानेंगे , कहेंगे अब अगले पाँच साल तक तुम्हे शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं हे ..... देश तुम जेसे लोगों की वजह से ही इस हाल में हे .... इत्यादि । में कहता हूँ बहुत खूब....आप सभी ने वोट किया, आप कोनसा किसी से शिकायत कर लेंगे । इतरा तो इसे रहे हे जेसे वोट करने के बाद आप की सारी बातें नेता लोग पांचो साल कान खोल के सुनेंगे । लेकिन में जानता हूँ की वोट करना भी ज़रूरी हे , एग्जाम्पल के लिए वोट दीजिये और बिग बाज़ार आपको सारी खरीद पे १० -२० % की छूट देगा.... । नुक्सान हर हाल में मेरा ही हे ।

लेकिन मेरे कुछ सवाल हे, उन सभी से जो वोट दे के आए और उन सब से देश में डेमोक्रेसी के करता धरता हे ।

पेहला सवाल, आप वोट किसी दे के आए पार्टी को या प्रत्याशी को ? अगर पार्टी कहीं बीच में नही थी तो में आप का सम्मान करता हूँ, लेकिन अगर पार्टी के नाम पे वोट दे के आए हे तो ये क्या गारंटी हे की सरकार बनाते हुए वो उन के साथ गद्बंधन नही करेगी जिनके विचार आप से नही मिलते ? एग्जाम्पल, लेफ्ट और कांग्रेस, सपा और भाजपा, तृणमूल और कांग्रेस आदि । तो जब आप के वोट का इस तरेह हर बार मज़ाक मनाया जा रहा हो तो में वोट क्यों डालूँ ? क्या सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में वोटिंग से पहले गद्बंधन फ्रीज़ नही होने चाहिए ? क्या ये चार्सो बीसी नहीं हे की पार्टी मुझसे वोट मांगते हुए कुछ कहती हे और सरकार बनाते हुए उसके विपरीत विचारों वाली पार्टी से हाथ मिला लेती हे ?

दूसरा सवाल, क्या आपने कभी वोट देने से पहले किसी भी पार्टी का मेनिफेस्टो जाना हे ? क्या कभी उन पे कोई चर्चा सुनी हे या उस में भाग लिया हे ? क्या मेनिफेस्टो चुनाव से सिर्फ़ एक महीने पहले किसी प्रेस कांफ्रेंस में रिलीज़ कर भूल जाना चाहिए ? जब मुझे ये पता ही नही चलता की कोई पार्टी मुझ से क्या वायदा कर रही हे तो में उसकी अकोउन्ताबिलिटी की क्या गारंटी लूँ , मुझे माफ़ करे मुझ में ये क्षमता नहीं ।

मेरा मानना हे की, हमारी डेमोक्रेसी कुछ नही बस एअक ढकोसला हे । सिर्फ़ चार्सो बीसी का खेल हे जिस में क्रिकेट जेसा रोमांच हे और जिसे क्रिकेट मैच की तरेह देख एन्जॉय किया जाए । यदि आप सेरिअस हे तो कोशिश करे की ये कुछ छोटे छोटे काम हो सकें -
  1. पार्टी अपनी मेनिफेस्टो जनता के सामने समय पे रखे और उन पे चर्चा करे । यदि कोई पार्टी ये नही करती तो उसको चुनाव न लड़ने दिया जाए ।
  2. वो पार्टी जिन के मेनिफेस्तोस कहीं मेल नही खाते वो सरकार एकसाथ न बना पाएं । ये सरासर धोकधादी और चार्सो बीसी हे ।
  3. गढ़बंधन चुनाव से पहले फ्रीज़ हो ।

और ये सब काम मुश्किल नही हे । क्या मीडिया , जुदिसिअरी और इलेक्शन कमीशन ये चार्सो बीसी रोक नही सकते ? रोक सकते हे, लेकिन जब हम सब को ये एहसास ही नही की हमे हर बार बेवकूफ बनाया जा रहा हे तो why would these agencies move the extra mile....they will not.